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संधिवात सिर्फ जोड़ों का दर्द नहीं, गति का छिन जाना है।

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संधिवात सिर्फ जोड़ों का दर्द नहीं, गति का छिन जाना है। कभी देखा है अपने पिता को, जो कभी कंधे पर बिठाकर मेला दिखाते थे, आज सीढ़ी चढ़ने से पहले दीवार पकड़ते हैं? कभी माँ को देखा है जो आंगन लीपती थी, आज घुटनों के कारण बैठकर उठ नहीं पाती? आयुर्वेद कहता है, जहाँ प्राण रुकता है वहीं वात रुकता है। संधि, यानी दो हड्डियों का मिलन, वह स्थान है जहाँ वात सबसे पहले कुपित होता है। जब आम, यानी अधपचा तत्व, इस वात के साथ संधि में बैठ जाता है तो वही संधिवात, गठिया बन जाता है। यह केवल शरीर नहीं, कर्मों की जड़ता का भी संकेत है। इसी जड़ता को काटने के लिए शास्त्रों में माँ काली के इस दिव्य कवच मंत्र का उल्लेख है। मंत्र: ॐ सन्धिषु पातु मां काली स्नायुषु चण्डनायिका। सन्धिवातं हर क्षिप्रं गतिं देहि दृढ़ां मम॥ इसका मर्म समझिए: सन्धिषु पातु मां काली, हे माँ काली, आप मेरे हर जोड़ की रक्षा करो। स्नायुषु चण्डनायिका, हे चण्डनायिका, आप मेरे स्नायु, नस और नाड़ियों की रक्षा करो। मान्यता है कि जब माँ काली संधि की और चण्डनायिका स्नायु की रक्षा करती हैं, तो शरीर में फिर से गति, स्थिरता और दृढ़ता लौट आती है। यह मंत्र केवल ...

वक्री बुध

कमजोर, पीड़ित, अस्त और वक्री बुध में अंतर, फल एवं उपाय 🧿 बुध हमारी बुद्धि, तर्क, समझने और सीखने की क्षमता, वाणी, संवाद, लेखन, गणना, व्यापारिक समझ, विश्लेषण, जानकारी को ग्रहण करने, परिस्थितियों के अनुसार सोच बदलने और अपनी बात सही तरीके से सामने रखने की क्षमता के प्रमुख कारक हैं। 🧿 कमजोर बुध - बुध की ताकत कम है बुध की ताकत कम हो तो उसे कमजोर बुध कहा जाता है। जैसे बुध मीन राशि में नीच का हो, नवांश में भी कमजोर स्थिति में चला जाए या कुंडली में उसे पर्याप्त बल न मिल रहा हो। लेकिन केवल नीच राशि देखकर बुध को पूरी तरह कमजोर नहीं मानना चाहिए। नीचभंग, नवांश, भाव, ग्रहों की दृष्टि और बुध को मिलने वाले दूसरे बल भी देखने जरूरी हैं। 🔸 फल - जातक बुद्धिमान होने के बाद भी अपनी बात सही समय पर सही तरीके से रखने में परेशानी महसूस कर सकता है। किसी विषय को समझने में बार-बार उलझन, निर्णय लेते समय अधिक विकल्पों में फँस जाना, छोटी बातों में भी अधिक सोच-विचार करना, गणना या कागजी काम में गलती करना या सामने वाले की बात का सही अर्थ समझने में परेशानी दिखाई दे सकती है। शिक्षा, व्यापार, संवाद, लेखन, गणना, दस्तावेज...

4 th house in kundali

अपना चतुर्थ भाव देखिए—यही तय करेगा कि आपके घर में मानसिक शांति होगी या तूफान, माँ का आशीर्वाद मिलेगा या संघर्ष  लोग कुंडली पढ़ते हैं, लोग ग्रह गिनते हैं।  लेकिन जब आप अपना चतुर्थ भाव देखते हैं, तो ब्रह्मांड स्वयं बैठकर कहता है कि यही भाव तय करेगा कि तुम्हारे जीवन में सुख होगा या संघर्ष, शांति होगी या अशांति, माँ का आशीर्वाद होगा या उनसे दूरियाँ। चतुर्थ भाव वह गुप्त मंदिर जहाँ आपकी नियति लिखी जाती है ज्योतिष शास्त्र कहता है कि चतुर्थ भाव सुख भाव है।   लेकिन मैं समझता हूं कि यह समाधान का भाव है, समर्पण का भाव है, आत्मा का आधार है। यह वह नींव है जिस पर आपका पूरा अस्तित्व टिका है।   इस भाव पर बनने वाले योग ही तय करते हैं कि आपके घर में मानसिक शांति होगी या तूफान, माँ का आशीर्वाद मिलेगा या उनसे दूरियाँ, जीवन में सुख-समृद्धि होगी या संघर्ष। चतुर्थ भाव आपकी नियति का वह कोना है जहाँ घर, माँ और आपकी आंतरिक शांति का फैसला होता है। जीवन में चतुर्थ भाव का महत्व क्या है ? ज्योतिष में बारह भाव होते हैं और हर भाव जीवन का एक पहलू दर्शाता है। लेकिन चतुर्थ भाव सबसे विशेष ...

राहु की महादशा

*राहू की महादशा में अंतरदशाओं का क्रम* महर्षि पाराशर द्वारा प्रतिपादित विंशोत्‍तरी दशा (120 साल का दशा क्रम) के अनुसार किसी भी जातक की कुण्‍डली में राहू की महादशा 18 साल की आती है। विश्‍लेषण के स्‍तर पर देखा जाए तो राहू की दशा के मुख्‍य रूप से तीन भाग होते हैं। ये लगभग छह छह साल के तीन भाग हैं। राहू की महादशा में अंतरदशाएं इस क्रम में आती हैं राहू-गुरू-शनि-बुध-केतू-शुक्र-सूर्य- चंद्र और आखिर में मंगल। किसी भी महादशा की पहली अंतरदशा में उस महादशा का प्रभाव ठीक प्रकार नहीं आता है। इसे छिद्र दशा कहते हैं। राहू की महादशा के साथ भी ऐसा ही होता है। राहू की महादशा में राहू का अंतर जातक पर कोई खास दुष्‍प्रभाव नहीं डालता है। अगर कुण्‍डली में राहू कुछ अनुकूल स्थिति में बैठा हो तो प्रभाव और भी कम दिखाई देता है। राहू की महादशा में राहू का अंतर अधिकांशत: मंगल के प्रभाव में ही बीत जाता है। राहू में राहू के अंतर के बाद गुरु, शनि, बुध आदि अंतरदशाएं आती हैं। किसी जातक की कुण्‍डली में गुरु बहुत अधिक खराब स्थिति में न हो तो राहू में गुरू का अंतर भी ठीक ठाक बीत जाता है, शनि की अंतरदशा भी कुण्‍डली में शनि ...

उत्तराषाढ़ा नक्षत्र

आपका जन्म नक्षत्र पिछले जन्म के कौन-से कर्मों का संकेत देता है? 🏆 उत्तराषाढ़ा नक्षत्र 🏆 पिछले जन्म की अधूरी जिम्मेदारी, प्रतिष्ठा और दीर्घकालिक लक्ष्य - इस जन्म में स्थायी सफलता, सत्यनिष्ठा, नेतृत्व और अपने वचन की कीमत समझने का कर्म 🎯 अगर आपका जन्म उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में हुआ है, तो संभव है कि आपकी जिंदगी की एक बहुत परिचित कहानी रही हो - आप जल्दी चमकने से ज्यादा लंबे समय तक टिकने वाली सफलता चाहते हैं। कोई काम केवल शुरू कर देना पर्याप्त नहीं लगता। आप चाहते हैं कि उसका परिणाम स्थायी हो। लोग कुछ दिन तारीफ करें और फिर भूल जाएँ, इससे मन पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता। भीतर इच्छा रहती है - ऐसा काम हो जो समय की परीक्षा सह सके, ऐसा नाम बने जो केवल दिखावे से नहीं, कर्म से बना हो। 🎯कई बार आपने देखा होगा कि दूसरे लोग जल्दी आगे निकल गए, लेकिन आपने धीरे-धीरे अपना स्थान बनाया। और शायद आपने जीवन में कई बार स्वयं से पूछा हो - मेरी जिंदगी में चीजें इतनी देर से क्यों बनती हैं, लेकिन जब बनती हैं तो बहुत जिम्मेदारी साथ क्यों लाती हैं? यहीं से उत्तराषाढ़ा नक्षत्र की कहानी शुरू होती है। 🎯 उत्तराषाढ़ा नक्षत...

मंगल जिस भाव का स्वामी हो उस भाव का कर्म क्यों लड़ना पड़ता है?

मंगल जिस भाव का स्वामी हो उस भाव का कर्म क्यों लड़ना पड़ता है? ज्योतिष में मंगल को हमने बहुत छोटा कर दिया है। उसे क्रोध कह दिया। झगड़ा कह दिया। भूमि कह दी। भाई कह दिया। दुर्घटना कह दी। लेकिन मंगल केवल क्रोध नहीं है। मंगल वह शक्ति है जो किसी विचार को कर्म में बदलती है। जो व्यक्ति को निर्णय लेने के लिए मजबूर करती है। जो भय के सामने खड़ा करती है। जहाँ रास्ता बंद हो वहाँ रास्ता बनाने की शक्ति देती है। इसलिए मंगल को समझना हो तो सबसे पहले यह समझिए कि मंगल जीवन में केवल घटना नहीं देता। वह व्यक्ति से कर्म करवाता है। यहीं से मंगल का एक बहुत गहरा नियम सामने आता है। मंगल जिस भाव का स्वामी होता है उस भाव के विषय जीवन में केवल दिखाई नहीं देते। उन विषयों के लिए व्यक्ति को स्वयं कुछ करना पड़ता है। उसे प्रयास करना पड़ता है। निर्णय लेना पड़ता है। कभी संघर्ष करना पड़ता है। कभी अपने अधिकार के लिए खड़ा होना पड़ता है। इसलिए मंगल जिस भाव का स्वामी हो उस भाव का कर्म कई बार लड़कर पूरा होता है। लेकिन यहाँ लड़ाई का अर्थ केवल झगड़ा नहीं है। किसी के लिए यह नौकरी पाने की लड़ाई है। किसी के लिए व्यवसाय खड़ा करने की।...

शनि देव

शनिदेव जन्मोत्सव 16 मई विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ शनि जिन्हें कर्मफलदाता माना जाता है। दंडाधिकारी कहा जाता है, न्यायप्रिय माना जाता है। जो अपनी दृष्टि से राजा को भी रंक बना सकते हैं। हिंदू धर्म में शनि देवता भी हैं और नवग्रहों में प्रमुख ग्रह भी जिन्हें ज्योतिषशास्त्र में बहुत अधिक महत्व मिला है। शनिदेव को सूर्य का पुत्र माना जाता है। मान्यता है कि ज्येष्ठ माह की अमावस्या को ही सूर्यदेव एवं छाया (संवर्णा) की संतान के रूप में शनि का जन्म हुआ। शनि पूजा (साधना) की सामान्य विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ शनिदेव की पूजा करने के लिये कुछ अलग नहीं करना होता। इनकी पूजा भी अन्य देवी-देवताओं की तरह ही होती है। शनि जयंती के दिन उपवास भी रखा जाता है।  शनिदेव का जन्म दोपहर के समय हुआ था, अतः शास्त्र अनुसार शनि देव की पूजा उपासना मध्यकाल के समय ही कि जानी चाहिये। भारत में अनेक स्थानों पर उदय तिथि के (पंचांग) अनुसार के पर्व संपन्न होता हैं।  शारीरिक शुद्धि के पश्चात लकड़ी के एक पाट पर साफ-सुथरे काले रंग के कपड़े को बिछाना चाहिये। कपड़ा नया हो तो बहुत अच्छा अन्यथा साफ अवश्य होना चाहिये। फिर इस ...