मंगल जिस भाव का स्वामी हो उस भाव का कर्म क्यों लड़ना पड़ता है?
मंगल जिस भाव का स्वामी हो उस भाव का कर्म क्यों लड़ना पड़ता है? ज्योतिष में मंगल को हमने बहुत छोटा कर दिया है। उसे क्रोध कह दिया। झगड़ा कह दिया। भूमि कह दी। भाई कह दिया। दुर्घटना कह दी। लेकिन मंगल केवल क्रोध नहीं है। मंगल वह शक्ति है जो किसी विचार को कर्म में बदलती है। जो व्यक्ति को निर्णय लेने के लिए मजबूर करती है। जो भय के सामने खड़ा करती है। जहाँ रास्ता बंद हो वहाँ रास्ता बनाने की शक्ति देती है। इसलिए मंगल को समझना हो तो सबसे पहले यह समझिए कि मंगल जीवन में केवल घटना नहीं देता। वह व्यक्ति से कर्म करवाता है। यहीं से मंगल का एक बहुत गहरा नियम सामने आता है। मंगल जिस भाव का स्वामी होता है उस भाव के विषय जीवन में केवल दिखाई नहीं देते। उन विषयों के लिए व्यक्ति को स्वयं कुछ करना पड़ता है। उसे प्रयास करना पड़ता है। निर्णय लेना पड़ता है। कभी संघर्ष करना पड़ता है। कभी अपने अधिकार के लिए खड़ा होना पड़ता है। इसलिए मंगल जिस भाव का स्वामी हो उस भाव का कर्म कई बार लड़कर पूरा होता है। लेकिन यहाँ लड़ाई का अर्थ केवल झगड़ा नहीं है। किसी के लिए यह नौकरी पाने की लड़ाई है। किसी के लिए व्यवसाय खड़ा करने की।...