संधिवात सिर्फ जोड़ों का दर्द नहीं, गति का छिन जाना है।
संधिवात सिर्फ जोड़ों का दर्द नहीं, गति का छिन जाना है। कभी देखा है अपने पिता को, जो कभी कंधे पर बिठाकर मेला दिखाते थे, आज सीढ़ी चढ़ने से पहले दीवार पकड़ते हैं? कभी माँ को देखा है जो आंगन लीपती थी, आज घुटनों के कारण बैठकर उठ नहीं पाती? आयुर्वेद कहता है, जहाँ प्राण रुकता है वहीं वात रुकता है। संधि, यानी दो हड्डियों का मिलन, वह स्थान है जहाँ वात सबसे पहले कुपित होता है। जब आम, यानी अधपचा तत्व, इस वात के साथ संधि में बैठ जाता है तो वही संधिवात, गठिया बन जाता है। यह केवल शरीर नहीं, कर्मों की जड़ता का भी संकेत है। इसी जड़ता को काटने के लिए शास्त्रों में माँ काली के इस दिव्य कवच मंत्र का उल्लेख है। मंत्र: ॐ सन्धिषु पातु मां काली स्नायुषु चण्डनायिका। सन्धिवातं हर क्षिप्रं गतिं देहि दृढ़ां मम॥ इसका मर्म समझिए: सन्धिषु पातु मां काली, हे माँ काली, आप मेरे हर जोड़ की रक्षा करो। स्नायुषु चण्डनायिका, हे चण्डनायिका, आप मेरे स्नायु, नस और नाड़ियों की रक्षा करो। मान्यता है कि जब माँ काली संधि की और चण्डनायिका स्नायु की रक्षा करती हैं, तो शरीर में फिर से गति, स्थिरता और दृढ़ता लौट आती है। यह मंत्र केवल ...