अस्त ,नीच, पीड़ित ग्रहों में अंतर
अस्त ,नीच, पीड़ित ग्रहों में अंतर
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तीनो ही परिस्थित जातक के लिए ठीक नही होता है, लेकिन सभी के अलग अलग तरीके से फलित होता है।।
1]अस्त ग्रह = जब सूर्य के काफी करीब ग्रह होते हैं तो अस्त ग्रह कहलाते हैं अस्त ग्रह होने पर उसके कारकत्व में कमी रह जाता है| आप उसके कारकत्व के क्षेत्र में नाम नही हो पाता है
आप गुमनाम रहा जाते है। जो उन्नति देना चाहिए वह उन्नति नहीं मिल पाता है। आपके कार्यक्षेत्र में आपसे ज्यादा कर्मठ लोग हो रहते हैं जिसकी तुलना में आप उनसे पीछे रह जाते हैं अस्त ग्रह समर्पण करता है यदि अस्त ग्रह वक्री हो जाए तो यह नियम नहीं लगता है क्योंकि वक्री ग्रह अपना हार नहीं मानता और उस कार्य में निरंतर लगा रहता है।
2]नीच ग्रह= नीच ग्रह कमजोर हो जाता है ऐसा कई लोगों का मानना है लेकिन मेरा मानना ऐसा नहीं है क्योंकि कभी-कभी ग्रह अपने मित्र के राशि में नीच के होते हैं और मित्र के राशि में कोई ग्रह शुभ ही फल देता है जैसे मंगल चंद्रमा की राशि में नीच का हो जाता है लेकिन चंद्रमा मंगल के मित्र है उसी प्रकार शुक्र बुध के घर में जाकर नीच हो जाता है लेकिन बुध और शुक्र में परस्पर मित्रता है वहां पर बुद्ध बुरे फल ना देकर उसके फलों में कमी कर जाता है।
नीच के ग्रह होने पर लोग अपने कारकत्व के प्रयोग गलत जगह use करता है । जैसे गुरु यदि नीच हो जाए तो जातक अपने ज्ञान का प्रयोग गलत जगह करता है,, जैसे मंगल नीच का हो जाए तो लोग अपने गुस्सा गलत जगह use करते है जहा use करना चाहिए वहा शांत करते है।। शुक्र जब नीच का हो जाए तो जातक ऐसे समाज में बैठे लगता है जहा उससे बैठने से कुछ नही मिलता है लोग ऐसा पसंद नही करते है फिर भी वह उन्हीं के साथ रहता है जहा से उनका पतन सुरु होता है।।
जब शनि नीच का हो जाता है तो जातक अपना मेहनत गलत जगह करता है जिससे उल्टे रिजल्ट्स मिलता है।।
3] पीड़ित ग्रह= पीड़ित होने पार जातक अपने कार्य क्षेत्र में अनकंफर्ट फिल करता है ,, जैसे कारण वह सफलता नही देता है,,।। यदि पीड़ित ग्रहों के साथ शुभ ग्रह भी बैठे हो तो कुछ लोग उनका सपोर्ट करते है ।।
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