12 house in kundali

√●●द्वादश भाव दुःख है।
★ इसलिये यह दुःस्थान है। 
★इस भाव में आया हुआ ग्रह अपने स्वरूप जन्य दुःख से जातक को प्रभावित करता है।
 ★सूर्य आत्मिक क्लेश देता है। 
★चन्द्रमा मानसिक क्लेश देता है।
★ मंगल दुर्घटनाएँ करता है। 
★बुध बुद्धि को विकल करता है।
★ गुरु ज्ञान का दुरुपयोग कराता है।
★शुक्र से वीर्य व्यर्थ जाता है। 
★शनि बन्धन में डालता है ,किन्तु शत्रु का पराभव करता है। 
★राहु अकारण पीड़ा पहुंचाता है। 
★ केतु मदमत करता है। 

√●द्वादश भव श्राद्ध स्थान है। जीव दिये हुए अन्न की इच्छा करते हैं, उन सबके लिये मैं यह अन्नदान करता हूँ। इससे वे परितृप्त और आनन्दित हो। अन्नाय नमः ।

 जिसके पास अन्न का अभाव है, वह कैसे श्राद्ध करे ? उसके लिये यह श्लोक है...

 "भूतानि सर्वाणि तथानपेतद्, 
अहं च विष्णुर्न ततोऽन्यदस्ति । 
 तस्मादहं   भूतनिकायभूतम्
 अन्नं प्रयच्छामि भवाय तेषाम् ॥" 
   (विष्णु पुराण ३।११।५४)

√★सम्पूर्ण प्राणी, यह अन्न और मैं सभी विष्णु हैं, क्योंकि उस (विष्णु) से भिन्न और कुछ है ही नहीं। अतः मैं समस्त भूतों का शरीररूप यह अन्न उनके पोषण के लिये दान करता हूँ।

जो व्यक्ति प्रतिदिन भोजन करता है, उसे प्रतिदिन भोजन कराना चाहिये, अन्न दान करना चाहिये। बलिवैश्व / अन्नदान एक नित्य कर्म है। वेद कहता है-

 "मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः 
सत्य नवीति वध इत्स तस्य ।
 नार्यमणं  पुष्यति नो सखायं 
केवलाघो भवति केवलादी ॥ " 
( ऋग्वेद १० | ११७ | ६)

√★अप्रवेताः अन्नं मोघम् विन्दते =अनुदार के अन्न को पाना (खाना) व्यर्थ है। अर्थात् अदानशील/ कंजूस व्यक्ति के यहाँ भोजन नहीं करना चाहिये।

 √★तस्य इत्स वधः = उस (अनुदार व्यक्ति) का अन्न विष/ विनाशक है।

√★ सत्यं ब्रवीति = यह सत्य कथन है। इस पर संदेह करना मूर्खता है ।

√★न अर्यमणम् नो सखायम् पुष्यति= (जो) न तो पितरों के प्रधान का पोषण करता और न मित्र को खिलाता है।

√★ केवलाघः केवली भवति =(वह) केवलादी (अकेले खाने वाला) अप (पाप) भोजी होता है। बिना दूसरों को बलि अर्पित किये अन्नदान दिये अकेले भोजन करने वाला व्यक्ति मानो पाप हो खाता है।

√★अन्न जल का दान करते रहने से पितरगण एवं जीव समुदाय ही नहीं, सबके अधिपति भगवान् विष्णु प्रसन्न रहते हैं। श्री महाराज जी प्रचेता हैं, उदार अन्नदाता हैं। धरती पर ऐसा व्यक्ति ढूंढ पाना कठिन है जो उन्हीं के समान शुद्ध अन्नदाता है। तस्मै नमः। भूयो भूयो नमः । 

√★द्वादश भाव प्रेत स्थान है। मरते समय अतृप्त इच्छाओं वाली प्रेतात्मा का उद्धार कठिन है। उस प्रेतात्मा की अभीप्सित वस्तुएँ सुपात्र को देने से उनको प्रेतयोनि से मुक्ति होती है। प्रेतयोनिगत आत्माएँ अपनी पूर्वप्रकृति के अनुरूप लोगों की देह मन बुद्धि विचार को आक्रान्त कर उन्हें अपने प्रभाव से ग्रस लेती हैं। दुष्ट आत्माएँ प्रतिशोध लेती हैं, नाना दुःख देती हुई जीवन को नर्क बना देती हैं। बुभुक्षित प्रेत से आक्रान्त जातक बहुत भोजन खाता है। प्रेतजन्य रोगों का औषधीय उपचार है ही नहीं ये मन्त्र-तन्त्र से जाते हैं। कामुक प्रेतात्माएं जातक के साथ काम क्रीड़ा करती हैं। पुरुष प्रेत सुन्दरयुवती को अपनी काम पिपासा का मास बनाते हैं। ये प्रेत सुन्दरी के विवाह में अप्रत्यक्ष बाधा पहुंचाते हैं। उसका विवाह नहीं होने देते और स्वयं उसका नित्य भोग करते हुए उसे तोड़ देते हैं। यह रतिकर्म उसे स्वप्न में हुआ सा जान पड़ता है और वह इसे कह नहीं सकती। जो युवतियाँ शुद्धाचार से नहीं रहतीं तथा देवोपासना नहीं करतीं, उन्हें इनका सर्वाधिक भय रहता है। कामुक स्त्री प्रेत कम नहीं होते। ये सुन्दर युवक मसते हैं। ये युवाओं के साथ रति करती हैं और उन्हें धीरे धीरे क्षीणकाय कर देती हैं। जिस घर में हवन होता है, वहाँ प्रेतात्मा का प्रवेश होता नहीं। प्रेतविद्या के जानने वाले प्रेतों को भगाते हैं तथा प्रेतों को लोगों पर करते भी हैं। प्रेत अपने को पुजवाते हैं। बी.बी.सी. लण्डन के अनुसार संसार में सर्वाधिक प्रेत इंगलैण्ड में हैं। जिन लोगों को पृथ्वी में गाड़ा जाता है, जलाया नहीं जाता, वे सभी प्रेत होते हैं और हजारों वर्ष तक इस योनि में भटकते हैं। महिमामय ऋषियों ने इसीलिये 'शवदहन' की पद्धति का आविष्कार किया। इस पद्धति की उपादेयता को अब म्लेच्छ भी स्वीकारने लगे हैं। यह वैज्ञानिक एवं प्रदूषण रहित विधि/ क्रिया है।

√★द्वादश भाव कलह है। जिस काल में कलह होता है, वह काल कलियुग नाम से जाना जाता है। जिस देश / स्थान में कलह होता है, वहाँ कलि देव का शासन होता है। कलियुग के विषय में पराशर का मत है...

" वर्गाश्रमाचारवती प्रवृत्तिर्न कसौ नृणाम्।
 न साम ऋग्यजुर्धर्मविनिष्पादन हैतुकी ॥
 विवाहा न कलौ धर्म्या न शिष्यगुरुसंस्थिति ।
 न दाम्पत्यक्रमो नैव वह्निदेवात्मकः क्रमः ॥" 
      (विष्णु पुराण ६।१।१०-११)

√★कलियुग में मनुष्यों की प्रवृत्ति वर्णाश्रम धर्म के अनुकूल नहीं रहती और न ऋक् यजु साम में वर्णित धर्म का निष्पादन करने वाली होती है। कलियुग में विवाह, गुरु शिष्य संबंध, दाम्पत्यक्रम, अग्नि में देवयज्ञ क्रिया का क्रम भी नहीं रहता कलौ कलहम्। जहाँ कलह (झगड़ा विमति वैमनस्य) हो, वहाँ कलियुग की उपस्थिति समझना चाहिये। परिवार में स्त्री-पुरुष पिता-पुत्र भाई-भाई के बीच झगड़ा, विधान सभाओं एवं संसद् में विभिन्न दलों के बीच वाक्युद्ध मारपीट का होना कलियुग की उपस्थिति का सूचक है। दम्भ, पाखण्ड, मिथ्यावाद स्वैराचार, अनुशासनहीनता, उत्पात, अकाल, अव्यवस्था एवं नाना रोगों का उद्भव कलियुग
के होने का प्रतीक है।

√★★★द्वादश भाव मोक्ष है। यह कैसे ? बन्धन स्थान मोक्ष कैसे हो गया ? द्वादश में नैसर्गिकतः मीन राशि है। मीन का स्वामी बृहस्पति है। बृहस्पति मोक्ष कारक ग्रह है। इसलिये द्वादश भाव का मोक्षप्रद होना उचित है। इस लोक के समस्त बन्धन कष्ट मृत्यु होते ही छूट जाते हैं। अतः यह भाव मोक्ष है। मोक्ष का अर्थ है-इस लोक के सुख-दुःख, राग-द्वेष, ऋण-संचय को यहीं छोड़ देना। इन सबका सम्बन्ध भौतिक देह से है। जब देह छूट गयी तो ये भी उसी के साथ रह जाते हैं। जीव अकेला होता है। कर्म संस्कारों का पाथेय उसके पास होता है। इस शरीर एवं तज्जन्य वस्तुओं लोगों से गहन लगाव होने पर व्यक्ति मरने के बाद भी मुक्त नहीं होता। जो मुक्त नहीं होता, उसका जन्म व्यर्थ है। इसी जन्म में ब्रह्म को जान लिया तो जन्म धन्य / सफल / सत्य है। यह उपनिषद् का वचन है...

 "इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति,
 न चेदिहावेदीन्महती  विनष्टि: ।
न भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः ,
 प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति । " 
       ( केनोपनिषद् ३।५)

【इह चेत्-अवेदीत्-अथ सत्यम् अस्ति न चेत्-इह अवेदीत् महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु वि-चित्य धीराः प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृताः भवन्ति ॥】

【●इह = यहाँ इस लोक में इस जन्म में ।
●चेत्= यदि ।
●अवेदीत् = जान लिया। 
●अथ = तो। 
●सत्यम् = सत्य, तन्दित, सफल, धन्य।
 ●अस्ति = है।
●न =नहीं ।
●चेत् = यदि ।
● इह= इस जन्म में ।
●अवेदीत् = जाना। 
●महती = बड़ी। विनष्टि हानि, क्षति, विनाश।
● भूतेषु-भूतेषु =सभी प्राणियों / जड़ चेतन पदार्थों में।
● विचित्य = भली प्रकार से चिन्तन करके, जानकर। 
●धीराः ज्ञानी पुरुष।
● प्रेत्य = मरकर ।
●अस्मात् = इस (से)।
● लोकात् = लोक (जन्म) से। 
●अमृताः= अमर मुक्त। 
●भवन्ति = होते हैं।】

√★यहाँ इसी जन्म में यदि ब्रह्म को जान लिया तो जन्म सफल है। यदि इस जन्म में ब्रह्म को न जाना तो महानाश है, जन्म विफल है। सब भूत प्राणियों में प्रभु की सत्ता को जान कर विद्वान् इस लोक से मरकर अमृत/ मुक्त हो जाते हैं।

Comments

Popular posts from this blog

श्री वृन्दावन धाम के सप्त देवालय

A BAMBOO

shivling