ईशान कोण आकाश का द्वार है
“ईशान कोण आकाश का द्वार है…और नैऋत्य पृथ्वी का आधार। इन दोनों के संतुलन का नाम ही वास्तु है।”
वास्तुशास्त्र केवल दिशाओं का साधारण ज्ञान नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी, ब्रह्मांड और ऊर्जा के बीच चलने वाले अदृश्य संतुलन को समझने का दिव्य विज्ञान है। जब हम किसी भवन, भूमि या घर को देखते हैं, तो वास्तव में हम केवल ईंट, पत्थर और दीवारें नहीं देख रहे होते, बल्कि एक ऐसे ऊर्जा-पात्र को देख रहे होते हैं जो ब्रह्मांडीय शक्तियों को ग्रहण भी करता है और धारण भी करता है। इसी गूढ़ सत्य को यदि एक सरल उदाहरण में समझना हो, तो एक “मटका” वास्तु का सबसे सुंदर प्रतीक बन जाता है।
कल्पना कीजिए कि यह पूरी पृथ्वी एक मटके के समान है। मटके का जो निचला भाग होता है — उसकी पेंदी — वही उसका आधार, उसका भार और उसकी स्थिरता होती है। यदि यही पेंदी कमजोर हो जाए, कट जाए या उसमें छेद हो जाए, तो पूरा मटका अस्थिर हो जाता है। वास्तु में यही स्थान S/W दक्षिण-पश्चिम अर्थात नैऋत्य दिशा का है। यह दिशा पृथ्वी तत्व की दिशा मानी गई है। स्थायित्व, सुरक्षा, नियंत्रण, परिपक्वता, धन की स्थिरता, परिवार और रिश्तों की मजबूती — ये सभी बातें नैऋत्य दिशा से संचालित होती हैं। इसलिए वास्तु में नैऋत्य दिशा अर्थात दक्षिण-पश्चिम, S/W को भारी, ऊँचा और स्थिर रखने का विधान बनाया गया है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि ऊर्जा के संरक्षण का गहरा विज्ञान है।
अब मटके के ऊपरी खुले भाग को देखिए। वहीं से वर्षा का जल उसमें प्रवेश करता है। आकाश से आने वाली प्रत्येक बूंद उसी मुख से भीतर समाती है। वास्तु में यही स्थान उत्तर-पूर्व अर्थात ईशान कोण का है। यह दिशा जल तत्व, दिव्यता, प्रेरणा, ज्ञान और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश द्वार मानी गई है। सूर्योदय की पहली किरण, चुंबकीय प्रवाह, सकारात्मक कंपन और सूक्ष्म ऊर्जाएँ उत्तर और पूर्व दिशा से ही पृथ्वी पर अधिक प्रभावी रूप में प्रवेश करती हैं। यही कारण है कि वास्तु में उत्तर और पूर्व दिशाओं को खुला, स्वच्छ, हल्का और पवित्र रखने की सलाह दी जाती है। वैसे तो सभी दिशाएं शुभ होती हैं पर हमारे पूर्वज पूर्व मुखी मकान और उत्तर मुखी मकान को अत्यधिक शुभ मानते थे और हम भी यही मानते हैं, अगर आप पोस्ट मे दिए चित्र के हिसाब से समझें तो पूर्व मे या उत्तर मे दरवाजा बनाया जाए तो मटका कम छतिग्रस्त होगा, अर्थात शुभता धारण करने की छमता मटके मे अधिक होगी।
यदि मटके का मुख सही दिशा में खुला हो, तो उसमें अमृत समान जल भरता रहता है। लेकिन यदि उसी मटके में नीचे की ओर छेद कर दिया जाए, तो चाहे ऊपर से कितना भी जल आए, वह टिक नहीं पाएगा। यही सिद्धांत वास्तु में दक्षिण और पश्चिम दिशाओं पर लागू होता है। यदि दक्षिण-पश्चिम में गड्ढा बना दिया जाए, अत्यधिक खुलापन रखा जाए, पानी रखा जाए या मुख्य द्वार बना दिया जाए, तो घर की ऊर्जा स्थिर नहीं रह पाती। धन आता है लेकिन टिकता नहीं, अवसर मिलते हैं लेकिन स्थायित्व नहीं आता, संबंध बनते हैं लेकिन उनमें मजबूती नहीं रहती। क्योंकि जिस दिशा का कार्य ऊर्जा को संभालना था, वहीं से ऊर्जा का रिसाव प्रारंभ हो जाता है।
वास्तु का वास्तविक रहस्य यही है कि उत्तर और पूर्व दिशाएँ ऊर्जा को ग्रहण करती हैं, जबकि दक्षिण और पश्चिम दिशाएँ उस ऊर्जा को स्थिर और सुरक्षित रखती हैं। और इन दोनों के संतुलन का केंद्र है नैऋत्य — दक्षिण-पश्चिम। यही कारण है कि वास्तुशास्त्र में दक्षिण-पश्चिम को घर का “ऊर्जा-आधार” कहा गया है। जैसे पृथ्वी अपनी धुरी पर संतुलित होकर पूरे सौरमंडल में स्थिरता बनाए रखती है, वैसे ही घर का नैऋत्य कोण पूरे भवन की ऊर्जा को स्थिर बनाए रखता है।
आज आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार कर चुका है कि पृथ्वी पर चुंबकीय तरंगें, गुरुत्वीय प्रभाव और कॉस्मिक रेडिएशन निरंतर कार्य कर रहे हैं। हजारों वर्षों पहले हमारे ऋषियों ने इन्हीं शक्तियों को अनुभव करके वास्तुशास्त्र की रचना की थी। इसलिए वास्तु अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति और ब्रह्मांड के नियमों के साथ सामंजस्य स्थापित करने का विज्ञान है।
जब घर का उत्तर-पूर्व खुला होता है और दक्षिण-पश्चिम मजबूत होता है, तब वह भवन केवल रहने की जगह नहीं रह जाता, बल्कि वह ऊर्जा, समृद्धि, शांति और स्थिरता का जीवंत केंद्र बन जाता है। यही वास्तु का सार है…
ऊर्जा को सही दिशा से ग्रहण करना और सही स्थान पर स्थिर करना।
प्रिय मित्रों मै आप का वास्तुमित्र आचार्य. उदय प्रकाश शर्मा, मैने इस पोस्ट में संलग्न चित्र को केवल प्रतीकात्मक रूप में आप के सामने रखा है, जो सिर्फ उदाहरण के लिए यह दिखाता है कि किस प्रकार पृथ्वी पर ब्रह्मांड से आने वाली ईशान्य दिशा की ऊर्जा S/W दिशा मे रखे एक मटके रूपी पात्र मे संचित होती है, अतः इस चित्र से यह विषय सरलता से समझने हेतु हि प्रयोग करें, इसे साइंस के मापदंडों पे न परखें।
मित्रों मैने इस पोस्ट को निरंतर अध्ययन-अध्यापन, व अपने कार्य अनुभवों के आधार पर तैयार किया है, हम सभी जानते हैं कि वास्तुशास्त्र में बहुत मत-मतांतर हैं, अतः पोस्ट को पढ़ें, समझें अनुभव करें, अपने व्यवहार में उतारें। कुतर्क और बिना मतलब की बहस न करें। यह मेरी अपनी इच्छा है कि वास्तु विषय को जिस सरल अंदाज से मै समझने का प्रयास करता हूं उसी सरल अंदाज में समाज से साझा करूँ, जिससे लोग वास्तु को लेकर भ्रम और डर में न पड़कर खुद अपने घर को सुधार सकें। अगर आप के कुछ सुझाव हैं तो कृपया मर्यादित शब्दों में मुझे लिखें, कुछ भी अनाप-शनाप कमेंट करने से बचें, जिस विषय कि बात हो रही है उसी विषय पे रहें । पूरा आलेख ध्यान से पढ़ने हेतु आप का धन्यवाद।
मित्रों अगर आप को मेरी यह पोस्ट पसंद आई हो तो एक लाइक के साथ एक प्यारा सा कमेंट जरूर करें जिससे मुझे इसी प्रकार की और वास्तु की पोस्ट लिखने की प्रेरणा प्राप्त हो।
UDAY VASTU
आचार्य उदय प्रकाश शर्मा
Vastu mumbai
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
.
#VastuShastra #VastuTips #HomeEnergy #PositiveEnergy #VastuExpert #SunEnergy #SpiritualScience #VastuConsultant #EnergyFlow #AncientWisdom #ModernVastu #SuccessEnergy #VastuKnowledge #TrendingNow
#SouthWestVastu #HomeConstruction #VastuExpert #IndianVastu #HousePlanning #PositiveEnergy #ConstructionMistakes
#nonfollowersviewersfollowersシ゚viralfollowersシ゚
Comments
Post a Comment